कोरोना : हवाई जहाज से हवाई चप्पल तक ✍️जितेंद्र शर्मा
सच क्या है? यह तो ऊपर वाला ही जाने पर दावा यही है कि कोरोना वायरस सबसे पहले चीन के शहर वुहान में पनपा और वहां से चीन के ही दूसरे शहरों के साथ साथ विश्व के अन्य देशों में पांव पसारता गया। इस महामारी या बीमारी के वैश्विक होने के पहले ही वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया था कि कोविद 19 नामक यह कोरोना वायरस हवा, पानी, मिट्टी या अन्य किसी जीव-जंतु से नहीं फैलता अपितु इसका संवाहक मानव ही है। मतलब साफ है कि जो लोग चीन से इस दौरान बाहर के देशों में गए उनके सहारे ही दूसरे देशों में यह बीमारी फैली। हो सकता है कि भारत सहित कुछ देशों में समुद्र के रास्ते यह बीमारी पहुंची हो पर ज्यादातर देशों में यह महामारी हवाई मार्ग से ही पहुंची है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। 12 मई तक की खबर के मुताबिक इस महामारी ने विश्व में 2 लाख 87 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली है। खबरें बताती हैं कि दुनिया के अमेरिका, रूस, स्पेन, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, तुर्की और इरान ऐसे देश हैं जहां कोरोना प्रभावितों की संख्या एक लाख से ज्यादा 12 मई तक दर्ज की गई है। जबकि भारत में 70,756 लोग प्रभावित पाए गए और 2293 लोगों की मौत इस बीमारी से हो गई।
मीडिया स्रोतों के अनुसार हमारे प्रधानमंत्री ने संकेत मिलते ही पहल करते हुए देश भर में पहले जनता कर्फ्यू लगाया फिर लॉक डाउन की घोषणा की। उनके इस आदेश का न केवल राज्य सरकारों ने बल्कि देशभर की जनता ने बिना कोई सवाल किए पालन किया। लेकिन दुर्भाग्य रहा कि इसके पहले और इस दौरान भी कई लोग विदेशों से हवाई मार्ग से हिंदुस्तान की धरा पर उतरे और इनमें से कई लोग ऐसे थे जिनके साथ कोरोना के वायरस भारत पहुंच गए थे। हालांकि विपक्ष के नेता राहुल गांधी का यह बयान आता रहा कि वे कोरोना संकट की भयावता का संकेत सरकार को पहले ही दे चुके थे लेकिन सरकार ने निर्णय लेने में देर की जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है। बहरहाल हवाई मार्ग से पहुंची इस महामारी से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने व्यापक इंतजाम किए। हर स्तर पर नौकरशाहों और जनता का साथ भी मिला। लेकिन एक बड़ी चूक इस दौरान सरकारों से हुई वह थी देश की करीब 80 फीसदी ग्रामीण आबादी का पर्याप्त चिंता नहीं करना। इसमें वे भी लोग आते हैं जो शहरों की निचली, मलीन और गरीब बस्तियों में भी बसते हैं और पेट की ज्वाला शांत करने दूसरे शहरों में मेहनत मजदूरी करने जाने के लिए मजबूर होते हैं।
पूरे देश ने देखा है कि लॉक डाउन की घोषणा के साथ ही कैसे कल कारखाने और अन्य उद्यम बंद हो गए। इनके बंद होने से कैसे लाखों की संख्या में मजदूरों को निकाल दिया गया। उनके भूखो मरने की नौबत आ गई। लोग बड़ी संख्या में साधन के अभाव में पैदल ही अपने गांव-घर की ओर निकल पड़े। इस दौरान कोई दुर्घटना का शिकार होता रहा तो कोई अन्य किसी कारण से मौत तक को गले लगाता रहा। कुछ तो ऐसी भी खबरें आईं जब माताएं रास्ते में ही शिशु को जन्म देने विवश हो गईं और कोई सहायता करने वाला तक नहीं था। सोशल मीडिया पर कई ऐसे फोटो और वीडियो भी वायरल हुए जिसमें गर्भवती बहनें सिर पर समान का बोझ लिए पति और बच्चों के साथ सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पर निकल पड़ी थीं। कई जगहों तो उनपर पुलिस के डंडे भी बरसे। लेकिन सरकारें और विपक्ष में बैठे नेताओं के केवल बयान आते रहे। कहीं कहीं कुछ सरकारों ने थोड़े बहुत प्रयास किए पर वो नाकाफी ही रहे। मतलब यह कि हवाई जहाज के रास्ते देश में जो बीमारी आई उसे सबसे ज्यादा यदि किसी ने भोगा है तो वे हैं सडक़ पर नंगे पांव या हवाई चप्पल पहने दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हुए लोग।
बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। लॉक डाउन के पहले और दूसरे चरण को तो इन्होंने भोगा ही है। तीसरे चरण में भी अनचाहे से बोझ बने हुए हैं। क्योंकि मजदूर ही तो हैं। फिर भी जवाबदारी तो सरकारों की ही बनती है सो रेल गाडिय़ों और कुछ जगहों पर बसों आदि के बंदोबस्त इनके लिए किए गए। लेकिन फिर वही सवाल क्या ये इंतजाम पर्याप्त हैं? शायद नहीं। लेकिन इन्हें लेकर श्रेय लेने में किसी ने कोई कमी नहीं छोड़ी। भले ही ट्रेन के किराए के पैसे को लेकर लड़ते रहे हों। खैर ये तो रही बात इनकी परेशानियों की जो ये झेलते ही आ रहे हैं क्योंकि मजदूर जो हैं। अब जब देश तीसरे से चौथे चरण की ओर रुख कर रहा है। यही मजदूर जो सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर अपने गांव-घर पहुंच रहे हैं। सरकार के लिए चिंता का कारण बन रहे हैं क्योंकि लाखों की इस आबादी का कोई रोड मेप तो कभी किसी ने बनाया नहीं। पता नहीं किस शहर से कौन संक्रमित होकर गांव पहुंच जाए और महामारी विकराल रूप में सामने आ जाए। वैसे लॉक डाउन के तीसरे चरण में जिस गति से कोरोना के मरीज देश में बढ़ रहे हैं और चिंतकों के जो आंकड़े आ रहे हैं वह भयावह है। ईश्वर करे हवाई जहाज से पहुंचे इस महामारी की काली छाया हवाई चप्पल वालों पर न पड़े। पहले ही बेचारों ने बहुत सहन किया है।
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